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अम्मी बनी सास

 


इस स्टोरी का आगाज़ झेलम सिटी में हुआ और स्टोरी के में किरदार कुछ यूँ हैं।

ज़ाहिद महमूद: उमर 32 साल (भाई)

जॉब: एएसआइ (असिस्टेंट सब इनस्पेक्टर इन पंजाब पोलीस) रवैती पोलीस वालो की बजाय एक तंदुरुस्त (बिना बढ़े हुए पैट के) स्मार्ट और फिट इंसान।

मॅरिटल स्टेटस: सो कॉल्ड "कंवारा"

ज़ाहिद अभी ताक गैर शादी शुदा ज़रूर है मगर "कंवारा" नही।

शाज़िया ख़ानम: उमर 30 साल (बेहन)

वज़न के हिसाब से थोड़ी मोटी और भारी जिस्म की मालिक है। इस वज़ह से उस के मोटे और बड़े मम्मों का साइज़ 40 ड्ड और उभरी हुई चौड़ी गान्ड का साइज़ 42 है।

साथ में सोने पर सुहागा कि बाक़ी बहनो की निसबत शाज़िया का रंग भी थोड़ा सांवला है।

स्टेटस: तलाक़ याफ़्ता

27 साल की उमर में शादी हुई और मगर दो साल बाद ही 29 साल की उमर में तलाक़ भी हो गई.और अब उस की तलाक़ हुए एक साल का अरसा बीत चुका है।

जॉब: स्कूल टीचर

रज़िया बीबी: उमर 55 साल (अम्मी)

स्टेटस: बेवा (विडो)

जॉब: हाउस वाइफ

इस के इलावा ज़ाहिद की दो और छोटी बहने भी हैं जो अब शादी शुदा हैं।

एक बेहन अपने शोहर के साथ कराची में जब कि दूसरी बेहन क्वेटा में अपनी फॅमिली के साथ रहती है।

ज़ाहिद का एक सब से छोटा भाई ज़मान महमूद भी था। मगर बद किस्मती से वह "हेरोयन" (ड्रग) के नशे की लानत में मुबतिला हो कर कुछ साल पहले फोट हो चुका है।

चलें अब स्टोरी का आगाज़ करते हैं।

एएसआइ ज़ाहिद महमूद सुबह के तक़रीबन 7 बजे अपनी ड्यूटी पर जाने के लिए तैयार हो रहा था।

वो आज कल जीटी रोड झेलम के बिल्कुल उपर वेकिया पोलीस चोकी (पोलीस स्टेशन) काला गुजरं में तैनात (पोस्ट) था।

अगरचे ज़ाहिद महमूद को पोलीस में भरती हुए काफ़ी साल हो चुके थे। मगर दो महीने पहले ही उस की एएसआइ के ओहदे पर तराकी (प्रॉमोशन हुई थी और इस तैराकी के साथ ही वह अपनी पोलीस सर्विस के दौरान पहली दफ़ा किसी पोलीस स्टेशन का इंचार्ज भी मुकरर हुआ था।

ज़ाहिद ने ज्यों ही घर से बाहर निकल कर अपनी मोटर साइकल को किक लगा कर स्टार्ट किया। तो उसी वकत उस की 30 साला छोटी बेहन शाज़िया ख़ानम अपने जिस्म के गिर्द चादर लपेटे एक दम घर के अंदर से दौड़ती हुई बाहर आई और एक जंप लगा कर अपने भाई के पीछे मोटर साइकल पर बैठ गईl

शाज़िया: भाई जाते हुए रास्ते में मुझे भी मेरे स्कूल उतार दें। आज फिर मेरी सज़ूकी वॅन (स्कूल वॅन) मिस हो गई है।

ज़ाहिद: एक तो में हर रोज़ तुम्हें लिफ्ट दे-दे कर तंग आ गया हूँ। तुम टाइम पर तैयार क्यों नहीं होती?

शाज़िया: भाई में कोशिश तो करती हूँ मगर सुबह आँख ही नहीं खुलती... प्लीज़ मुझे स्कूल उतार दो ना मेरे अच्छे भाई, वरना मुझे बहुत देर हो जाएगी और मेरे स्कूल का प्रिन्सिपल मुझ पर गुस्सा हो गा।

शाज़िया ने पीछे से अपने भाई के कंधे पर अपना हाथ रखा और इल्तिजा भरे लहजे में भाई से कहा।

ज़ाहिद को ख़ुद अपने थाने पहुँचने में देर हो रही थी। मगर फिर भी उसे पहले अपनी बेहन को उस के स्कूल ड्रॉप करना ही पड़ा और यूँ ज़ाहिद अपनी बेहन को ले कर सिविल लाइन्स पर वाकीया हॅपी होम्स स्कूल के दरवाज़े पर आन पहुँचा।

ज्यों ही ज़ाहिद ने शाज़िया को ले कर उस स्कूल के सामने रुका तो उस के साथ ही एक स्कूल वॅन आ कर खड़ी हुई, जिस में से स्कूल के बच्चे और दो टीचर्स उतर कर बाहर आईl

उन टीचर्स में से एक टीचर ने शाज़िया की तरह अपने जिस्म के गिर्द चादर लपेटी हुई थी।

जब कि दूसरी टीचर ने बुर्क़ा पहना हुआ था। मुँह पर बुर्क़े के नक़ाब की वज़ह से उस टीचर की सिर्फ़ आँखे ही नज़र आ रही थीं। जब कि उस का बाक़ी का चेहरा छुपा हुआ था।

उन दोनों टीचर्स ने शाज़िया को अपने भाई के साथ मोटर साइकल पर बैठे देखा। तो उन्हो ने दोनों बेहन भाई के पास से गुज़रते हुए शाज़िया को सलाम किया।

शाज़िया अपने भाई की मोटर साइकल से उतरी और ज़ाहिद का शुक्रिया अदा करते हुए उन बच्चो और दोनों साथी टीचर्स के साथ स्कूल के गेट के अंदर चली गईl

ज़ाहिद भी अपनी बेहन को स्कूल उतार कर पोलीस चोकी आया और अपने रूटीन के काम में मसरूफ़ हो गया।

उसी दिन दोपहर के तक़रीबन 1 बजे का वक़्त था। जुलाइ के महीने होने की वज़ह से एक तो गर्मी अपने जोबन पर थी और दूसरा बिजली की लोड शेडिंग ने साब लोगों की मूठ मार रखी थी।

इस गर्मी की शिदत से निढाल हो कर ज़ाहिद पोलीस चोकी में बने हुए अपने दफ़्तर में आन बैठा।

आज थाने में उस को कोई ख़ास मसरूफ़ियत नहीं थी। इस लिए बैठा-बैठा एएसआइ ज़ाहिद महमूद अपनी गुज़री हुई ज़िंदगी के बारे में सोचने लगा।

अपनी सोचों में ही डूबे हुए ज़ाहिद महमूद अपनी पिछली ज़िंदगी के उस मुकाम पर पहुँच गया।जब कुछ साल पहले वह अपना एफए का रिज़ल्ट सुन कर ख़ुसी-ख़ुसी अपने घर वाकीया मशीन मोहल्ला नंबर 1 झेलम में दाखिल हुआ था।

ज्यों ही ज़ाहिद अपने घर के दरवाज़े को खोल कर घर में दाखिल हुवा तो घर के सहन में अपनी अम्मी और दूसरे भाई और बहनो को ज़रोर कतर रोता देख कर ज़ाहिद बहुत परेशान हो गया और वह दौड़ता हुआ अपनी अम्मी के पास पहुँचा।

ज़ाहिद: "अम्मी ख़ैरियत तो है ना, आप सब ऐसे क्यों रो रहे हैं"

अम्मी: बेटा ग़ज़ब हो गया, अभी-अभी ख़बर आई है कि तुम्हारे अब्बू एक पोलीस मुक़ाबले में हलाक हो गये हैंl"

ज़ाहिद के वालिद (अब्बू) करीम साब पोलीस में हेड कॉन्स्टेबल थे और वह ही अपने घर के वहीद कमाने वाले भी थे।

बाकी घर वालो की तरह ज़ाहिद पर भी यह ख़बर बिजली बन कर गिरी और उस की आँखो से भी बे सकता आँसू जारी हो गये।

कुछ देर बाद थाने वाले उस के अब्बू की लाश को आंब्युलेन्स में ले कर आए और फिर सब घर वालो के आँसू के साए में करीम साब की लाश को दफ़ना दिया गया।

चूँकि ज़ाहिद के अब्बू ने उस पोलीस मुक़ाबले में मुलजिमो (क्रिमिनल्स) के साथ जवां मर्दि से मुक़बला किया था।

इस लिए पोलीस डिपार्टमेंट ने उन की इस बहादुरी की क़दर करते हुए उन के बेटे ज़ाहिद को पोलीस में कॉन्स्टेबल भरती कर लिया।

कहते हैं कि हर इंसान की अपनी क़िस्मत होती है और किसी इंसान का सितारा दूसरे की निसबत अच्छा होता है। लगता था कि कुछ ऐसी ही बात ज़ाहिद के अब्बू करीम साब की भी थी।

क्यों कि घर के वहीद कमाने वाले होने के बावजूद, अपने जीते जी करीम साब अपने पाँच बच्चो और एक बीवी का ख़र्चा बहुत अच्छा ना सही मगर फिर भी काफ़ी लोगों से बेहतर चला रहे थे।

लेकिन अब उन की वफात के बाद जब घर का सारा बोझ ज़ाहिद के ना जवान कंधो पर आन पड़ा तो ज़ाहिद के लिए अपने घर का ख़र्चा चलाना मुश्किल होने लगा।

ज़ाहिद चूंकि नया-नया पोलीस में भरती हुआ था। इस लिए शुरू का कुछ अरसा वह रिश्वत (ब्राइब) को हराम समझ कर अपनी पोलीस की सॅलरी में गुज़ारा करने की कोशिस में मसरूफ़ रहा।

ज़ाहिद ने जब महसूस किया कि पोलीस की नोकरी में उस के लिए अपने घर का ख़र्चा पूरा करना मुश्किल हो रहा है।तो ज़ाहिद ने अपने एक दोस्त के मशवरे से अपनी ड्यूटी के बाद फारिग टाइम में "चिंग चे" (ऑटो रिक्शा) चलाना शुरू कर दिया।

इसी दौरान ज़ाहिद से छोटी उस की बेहन शाज़िया ने भी अपना एफए का इम्तिहान पास कर लिया और अपने भाई का हाथ बंटाने के लिए घर के करीब एक स्कूल में टीचर की जॉब शुरू कर दी।

शाज़िया दिन में स्कूल की जॉब करती और फिर शाम को घर में मोहल्ले के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने लगी।

दोनो बेहन भाई की दिन रात की महनत रंग लाने लगी और इस तरह महगाई के इस दौर में उन के घर वालों का गुज़ारा होने लगा।

ज़ाहिद और शाज़िया जो कमाते वह महीने के आख़िर में ला कर अपनी अम्मी के हाथ में दे देते।

ज़ाहिद और शाज़िया की अम्मी रज़िया बीबी एक सुगढ़ और समझदार औरत थी। वह जानती थी कि उस की बच्चियाँ और बच्चे अब जवान हो रहे हैं और जल्द ही वह शादी के काबिल होने वाले हैं।

इस लिए रज़िया बीबी ने अपने बच्चों की कमाई में से थोड़े-थोड़े पैसे बचा कर अपने मोहल्ले की औरतो के साथ मिल कर कमिटी डाल ली।ताके आहिस्ता-आहिस्ता कर के उस के पास कुछ पैसे जमा हो जाए तो वह वक़्त आने पर अपने बच्चो की शादियाँ कर सकेl

इस तरह दिन गुज़रते गये और दिन महीनो और फिर साल में तब्दील होने लगे। वकत इतनी तेज़ी से गुज़रा कि ज़ाहिद और उस की बेहन शाज़िया को पता ही ना चला।

ज़ाहिद को अपनी बेहन शाज़िया का घर से बाहर निकल कर नोकरी करना अच्छा नहीं लगता था।मगर वह मजबूरी के आलम में अपनी बेहन के इस क़दम को कबूल कर रहा था।

ज़ाहिद को उम्मीद थी कि उस का छोटा भाई ज़मान जो कि अब कॉलेज में मेट्रिक के बाद कॉलेज के फर्स्ट एअर में दाखिल हुवा था।वो जल्द ही पढ़ कर उस के साथ अपने घर का बोझ उठाए गा तो वह अपनी सब बहनो की शादी कर के अपना फर्ज़ पूरा कर दे गा।

इधर ज़ाहिद तो यह सोच रहा था मगर क़ुदरत को शायद कुछ और ही मंज़ूर था।

ज़ाहिद तो यह समझता था। कि उस की तरह उस का भाई ज़मान भी अपने काम से काम रखने वाला एक सीधा सादा लड़का है। मगर असल हक़ीकत कुछ और ही थी।

असल में ज़ाहिद के मुक़ाबले ज़मान का उठना बैठना कुछ ग़लत किसम के दोस्तो में हो गया। जिन्हो ने उस को हेरोइन के नशे की लूट लगा दी।

चूँकि ज़ाहिद तो दिन रात अपने घर वालो के लिए रोज़ी रोटी कमाने में मसरूफ़ था। इस लिए एक पोलीस वाला होने के बावजूद वह यह ना देख पाया कि उस का छोटा भाई किस रास्ते पर चल निकला है।

उस को अपने भाई के नशे करने वाली बात उस वक़्त ही पता चली। जब बहुत देर हो चुकी थी।

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